उत्तराखण्ड

संसदीय परंपराओं की अनदेखी

सतीश महाना। भारतीय लोकतंत्र की असल शक्ति एवं खूबसूरती चुनावों के अतिरिक्त उन संस्थाओं की गरिमा और कार्यसंस्कृति में निहित है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था को जीवंत बनाए रखती हैं। संसद इसी व्यवस्था का केंद्र है, और संसद के भीतर लोकसभा अध्यक्ष का पद उन कुछ संवैधानिक संस्थानों में से एक है जिनसे निष्पक्षता, संतुलन और गरिमा की सर्वोच्च अपेक्षा की जाती है। ऐसे समय में जब दुनिया के अनेक हिस्सों में संसदीय संस्थाएं राजनीतिक टकराव और अव्यवस्था के दबाव में कमजोर होती दिखाई दे रही हैं, भारत में लोकसभा अध्यक्ष के रूप में ओम बिरला का कार्यकाल संसदीय दक्षता और संवैधानिक मर्यादा का उदाहरण है। उनके नेतृत्व में लोकसभा ने लगभग 97 प्रतिशत की कार्य उत्पादकता हासिल की, जो पिछले दो दशकों में एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। वर्ष 2019 से अब तक आयोजित 21 सत्रों में से 10 सत्र ऐसे रहे, जिनमें सदन की उत्पादकता 100 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई। वर्ष 2025 के शीतकालीन सत्र में तो लोकसभा ने निर्धारित समय से भी अधिक काम करते हुए 103 प्रतिशत कार्य निष्पादित किया।
लोकसभा अध्यक्ष का पद केवल सदन की कार्यवाही चलाने तक सीमित नहीं होता। भारतीय संविधान के अंतर्गत अध्यक्ष को सदन का संरक्षक या ‘कस्टोडियन’ माना गया है। इसका अर्थ है कि वह न केवल प्रक्रियाओं की निगरानी करते हैं, बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श को संतुलित और सार्थक बनाए रखने की जिम्मेदारी भी निभाते हैं। ओम बिरला ने सदन में समय के आवंटन को संख्या बल के आधार पर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भागीदारी के आधार पर सुनिश्चित करने का प्रयास किया है। 17वीं लोकसभा में सत्ता पक्ष के भारी बहुमत के बावजूद विपक्ष और गैर-राजग दलों को कुल चर्चा समय का लगभग 61.05 प्रतिशत अर्थात 807 घंटे प्रदान किए गए।
लोकसभा में उनके विरुद्ध लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि स्पीकर का पद दलगत राजनीति से ऊपर होता है और संविधान ने उसे मध्यस्थता की भूमिका दी है। ऐसे पद पर बैठे व्यक्ति के प्रति अविश्वास का सवाल उठाना लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुकूल नहीं माना जा सकता। ओम बिरला ने संसदीय प्रक्रिया को अधिक समावेशी बनाने के लिए ‘फर्स्ट टाइमर्स फर्स्ट’ की नीति अपनाई है, जिसके अंतर्गत नव निर्वाचित और अपेक्षाकृत कम चर्चित सांसदों को अपनी बात रखने के लिए प्राथमिकता दी जाती है। इससे सदन की लोकतांत्रिक प्रकृति और अधिक व्यापक हुई है।
ओम बिरला के कार्यकाल का एक महत्वपूर्ण पहलू संसदीय प्रणाली के संस्थागत सुदृढ़ीकरण से जुड़ा है। नव निर्वाचित सांसदों के लिए प्रबोधन कार्यक्रम आयोजित करना इसी दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है। इन कार्यक्रमों के माध्यम से नए सांसदों को संसदीय प्रक्रिया, नियमों और संसदीय परंपराओं से परिचित कराया जाता है। लोकसभा के संसदीय शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान ‘प्राइड’ के माध्यम से विभिन्न विधानसभाओं तथा संसद के अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए भी प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
इसके अतिरिक्त, समिति प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने के उद्देश्य से पीठासीन अधिकारियों की एक समिति का गठन भी किया गया है, जिसका उद्देश्य संसद तथा राज्य विधानसभाओं की समिति व्यवस्था की समीक्षा करना है। ओम बिरला के नेतृत्व में लोकसभा को ‘पेपरलेस’ बनाने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। डिजिटल संसद प्लेटफार्म की स्थापना, सांसदों के लिए डिजिटल अटेंडेंस प्रणाली और आनलाइन आनबोर्डिंग जैसी व्यवस्थाएं इसी परिवर्तन का हिस्सा हैं। इसी क्रम में ‘नेशनल ई-विधान’ कार्यक्रम को भी व्यापक स्तर पर लागू किया गया है।
संसदीय कार्यवाही में एआइ के उपयोग से संसद की 18,000 से अधिक घंटों की ऐतिहासिक कार्यवाही का डिजिटलीकरण किया गया है, जो संसदीय विरासत के संरक्षण की दिशा में बड़ी उपलब्धि है। संसदीय कार्यों के लिए ‘संसद भाषिणी’ जैसे स्वदेशी एआइ टूल का उपयोग कर संसदीय दस्तावेजों को विभिन्न भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है। बोडो, डोगरी, मैथिली, मणिपुरी, उर्दू और संस्कृत जैसी भाषाओं को भी इसमें शामिल किया गया है। एक व्यापक डिजिटल पार्लियामेंट लाइब्रेरी की स्थापना भी की गई है।
यह सांसदों, शोधकर्ताओं और आम नागरिकों के लिए संसदीय दस्तावेजों तक पहुंच को आसान बनाती है। विधेयकों पर ब्रीफिंग सत्रों के माध्यम से सांसदों को विधेयकों की पृष्ठभूमि और प्रविधानों को विस्तार से समझने का अवसर मिला है, जिससे सदन में होने वाली बहसें अधिक सार्थक और तथ्यपरक बन सकी हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लोकसभा के अध्यक्ष के रूप में ओम बिरला की भूमिका सक्रिय रही है। भारत में आयोजित पी-20 सम्मेलन में जी-20 देशों की संसदों के अध्यक्षों ने भाग लिया।
ब्रिक्स पार्लियामेंट्री फोरम और इंटर पार्लियामेंट्री यूनियन की सभाओं में भी भारत की सक्रिय भागीदारी ने वैश्विक संसदीय मंचों पर देश की भूमिका को मजबूत किया है। इसके बावजूद संसद में अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाए जाने की प्रवृत्ति संसदीय परंपराओं को कमजोर करती है। संसदीय दक्षता, पारदर्शिता, निष्पक्षता और गरिमा के जो मानक उनके कार्यकाल में स्थापित हुए हैं, वे आने वाले समय में भारतीय लोकतंत्र की संस्थागत स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनेंगे।

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