उत्तराखण्ड

नई पीढ़ी को खेती के प्रति प्रोत्साहित करने की जरूरत

खेती को बढ़ावा देने के लिए नई पीढ़ी को खेती के प्रति प्रोत्साहित करने की जरूरत है। जब नई पीढ़ी इस दिशा में आगे आएगी और वैज्ञानिक तरीके से खेती करेगी तभी खेती लाभकारी साबित हो सकेगी। कृषि भूमि को सुरक्षित रखे जाने की जरूरत है। कृषि भूमि लगातार घटती जा रही है। जिसके मुख्य कारण शहरीकरण, औद्योगीकरण, जनसंख्या वृद्धि और किसानों का पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन शामिल हैं। इससे उपजाऊ भूमि घट रही है और प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण हो रहा है। शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों के विस्तार के कारण कृषि भूमि पर इमारतें और सड़कें बन रही हैं, जिससे भूमि का घनत्व कम हो रहा है। बढ़ती आबादी के कारण भोजन और आवास की मांग बढ़ रही है, जो कृषि भूमि पर दबाव डाल रही है। पर्वतीय क्षेत्रों से लोगों के शहरों की ओर पलायन करने और पारिवारिक विरासत में भूमि बंटने से खेत छोटे और गैर-लाभदायक हो जाते हैं। अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से भूमि की उर्वरता कम हो रही है, जबकि जलवायु परिवर्तन और अनियमित वर्षा भी कृषि भूमि को प्रभावित कर रही है। उत्तराखंड जैसे राज्यों में, पर्वतीय क्षेत्रों से निरंतर पलायन और मैदानी इलाकों में बढ़ता शहरीकरण कृषि भूमि में भारी कमी ला रहा है। राज्य गठन के बाद पर्वतीय क्षेत्रों में खेती योग्य भूमि में भारी गिरावट आई है, जिससे परती भूमि का क्षेत्रफल बढ़ रहा है। विकास परियोजनाओं के लिए उपयुक्त गैर-कृषि भूमि का सर्वेक्षण करना और कृषि भूमि को बचाना महत्वपूर्ण है। नई पीढ़ी को खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना, क्लस्टर-आधारित खेती को बढ़ावा देना, और जैविक खेती को अपनाने के लिए सहायता प्रदान करना ज़रूरी है।
देश की अधिकांश बंजर और अत्यधिक क्षरित भूमि पर सीमांत किसान निवास करता है, उनकी आजीविका भी इसी पर टिकी हुई है। इसलिए बंजर भूमि का विकास किया जाना जरूरी है, बंजर भूमि को उपजाऊ बनाया जाए और उस पर प्राकृतिक खेती की जाए। एक रिपोर्ट के अनुसार देश में 2018-19 से 2021-22 तक खेती योग्य जमीन का दायरा घटकर 180.62 मिलियन हेक्टेयर से घटकर 180.11 मिलियन हेक्टेयर हो गया है। यह रिपोर्ट राज्यों को सुझाती है कि औद्योगिक और निर्माण गतिविधियों आदि के लिए वे बंजर भूमि का उपयोग करें। भारत में कुल 14 करोड़ हेक्टेयर पर नियमित खेती होती है। आज खेती की जो हालत है, जिस तरह उसमें कीटनाशकों और रासायनिक खादों का इस्तेमाल बढ़ा है, उसकी वजह से खेती की मिट्टी भी खराब हो चुकी है। अब कैंसर, ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों के लिए विशेषज्ञ रासायनिक खाद और कीटनाशक युक्त खेती को भी जिम्मेदार बता रहे हैं। प्राकृतिक या जैविक खेती को बढ़ावा दिये जाने की जरूरत है। इस खेती के जरिए होने वाली उपज को स्वास्थ्य वर्धक माना जाने लगा है। लेकिन खेती की मौजूदा जमीन को सुधारना एक दिन का काम नहीं है और उसे सुधारने में बहुत वक्त लगेगा। इसलिए अब मांग होने लगी है कि जो वर्जिन लैंड यानी बंजर जमीन है, उसे तैयार करके उस पर प्राकृतिक और जैविक खेती करने के लिए अनुमति मिलनी चाहिए। वैसे देश की करीब 40 फीसद आबादी अपनी आजीविका के लिए बंजर भूमि पर निर्भर है। ज्यादातर यह आबादी मुख्यतः ग्रामीण है। एक रिपोर्ट के अनुसार देश में लगभग 55.76 मिलियन हेक्टेयर बंजर भूमि है, जो कुल भौगोलिक क्षेत्र का 16.96 प्रतिशत है। अगर उचित उपचार किया जाए तो लगभग 50 प्रतिशत बंजर भूमि उपजाऊ बन सकती है। जो भूमि खाली पड़ी है, अनुत्पादक है, या जिसका पूरी क्षमता से उपयोग नहीं हो रहा हो, जिसकी उत्पादकता कम है, आमतौर पर उसे बंजर माना जाता है। बंजर भूमि में क्षरित वन, जलभराव वाली दलदली भूमि, पहाड़ी ढलान, अपरदन वाली घाटी, अतिचारित चारागाह और सूखाग्रस्त चारागाह शामिल हैं। 1985 में स्थापित राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड यानी एनडब्ल्यूडीबी, के अनुसार बंजर भूमि को क्षरण की सीमा के आधार पर कुछ समूहों में बांटा गया है। इसमें पहली श्रेणी में सांस्कृतिक बंजर भूमि आती है, जिसका कई वजहों से फिलहाल उपयोग नहीं हो रहा, लेकिन यह भूमि उचित उपचार के बाद उपजाऊ हो सकती है। जैसे झूम खेती वाली भूमि, क्षरित चरागाह और चरागाह भूमि, क्षरित वन भूमि, क्षरित गैर-वनीय वृक्षारोपण भूमि, पट्टीदार भूमि, रेतीले क्षेत्र, खनन और औद्योगिक बंजर भूमि, नाले और बीहड़ भूमि, जलभराव और दलदली भूमि, और लवण प्रभावित भूमि इस दायरे में आती है। दूसरी श्रेणी कृषि-अयोग्य बंजर भूमि कही जाती है। इसमें वह जमीन आती है, जिसका अभी उपयोग नहीं हो रहा है, और किसी भी हालत में उपजाऊ नहीं हो सकती या यहां पेड़-पौधे नहीं उग सकते। इस श्रेणी में पथरीली, तीव्र ढलान वाली और बर्फ से ढकी जमीन आती है। अनुमान है कि भारतीय जनसंख्या का 61.5 प्रतिशत ग्रामीण है और कृषि पर निर्भर है, और देश में 57.8 प्रतिशत ग्रामीण परिवार कृषि परिवार हैं। इसलिए, भूमि क्षरण कृषक समुदायों की स्थायी आजीविका सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है। क्षरित और बंजर भूमि को पुनः प्राप्त करने के लिए आवश्यक उपाय आवश्यक हैं ताकि सामाजिक और आर्थिक कारणों से अनुपयोगी होते जा रहे क्षेत्रों को पुनः प्राप्त करके और उत्पादन क्षमता के और नुकसान को रोककर पुनः प्राप्त किया जा सके। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि भूमि संसाधन सीमित हैं। वैसे बंजर भूमि को उपजाऊ और विकसित बनाने के लिए सरकारी स्तर पर कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना ऐसी ही योजना है। इसके तहत मृदा अपरदन को रोकने, प्राकृतिक वनस्पति को पुनर्जीवित करने, वर्षा जल का संचयन करने और भूजल स्तर को रिचार्ज करने के लिए मिट्टी, वनस्पति आवरण और पानी जैसे खराब प्राकृतिक संसाधनों का दोहन, संरक्षण और विकास के जरिए पारिस्थितिकीय संतुलन बहाल करने की तैयारी की जा रही है। इसके साथ ही पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय वनरोपण एवं पारिस्थितिकी विकास बोर्ड यानी एनएईबी भी बंजर भूमि के विकास के लिए योजनाएं चला रहा है। इसके तहत वनरोपण को बढ़ावा दिया जा रहा है। ये वनरोपण स्थानीय पारिस्थितिकीय हालात पर केंद्रित होते हैं। इसके साथ ही एकीकृत वनरोपण और पारिस्थितिकी विकास परियोजना योजना, क्षेत्रोन्मुख ईंधन लकड़ी और चारा परियोजना योजना, औषधीय पौधों सहित गैर-लकड़ी वनों का संरक्षण एवं विकास योजना, वृक्ष एवं चारागाह बीज विकास योजना आदि भी चलाई जा रही हैं। जरूरत है कि बंजर भूमि को उपजाऊ बनाया जाए और उस पर प्राकृतिक खेती की जाए। जिसकी वजह से अपने यहां ना सिर्फ शुद्ध और प्राकृतिक खाद्यान्न का उत्पादन होगा, कृषि वानिकी और वानिकी का भी विकास होगा। तब हम प्रकृति के और ज्यादा नजदीक जा सकेंगे और हमारी दुनिया में बदलाव आए, जो सकारात्मक होगा, प्राकृतिक होगा और स्वास्थ्य वर्धक भी।

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