कैलाश विजयवर्गीय के बयान के बहाने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दिशा, दशा और व्यक्ति निर्माण की परंपरा पर एक विमर्श
– सुभाष चंद्र जोशी-
“बहुत भीड़ हो गई है और इस भीड़ में अच्छे इंसानों की कमी है।”
मध्य प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का यह कथन हाल के दिनों में व्यापक चर्चा का विषय बना। सामान्य तौर पर इसे एक राजनीतिक टिप्पणी माना जा सकता है, लेकिन यदि इस कथन को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की पृष्ठभूमि, उसकी कार्यपद्धति और उसके मूल उद्देश्य के संदर्भ में देखा जाए, तो यह एक गहरे आत्ममंथन का विषय बन जाता है। विशेष रूप से इसलिए भी क्योंकि विजयवर्गीय स्वयं लंबे समय से संघ की वैचारिक पृष्ठभूमि से जुड़े रहे हैं और संगठन की कार्यशैली को निकट से समझते हैं।
यह कथन केवल संघ के बारे में नहीं है। यह उन सभी संगठनों, संस्थाओं और आंदोलनों के लिए एक प्रश्न है जिनकी पहचान संख्या से अधिक व्यक्ति निर्माण, संस्कार, अनुशासन और सामाजिक दायित्वों के आधार पर बनी है। प्रश्न यह है कि क्या विस्तार की दौड़ में संगठन अपनी मूल आत्मा को बचाए रख पा रहे हैं? क्या संख्या बढ़ने के साथ गुणवत्ता भी उसी अनुपात में बढ़ रही है? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या व्यक्ति निर्माण की वह परंपरा, जिसने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन बनाया, आज भी उतनी ही प्रभावी है जितनी पहले थी?
संघ की स्थापना: एक संगठन नहीं, एक विचार
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना विजयादशमी 1925 को डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में की थी। उस समय भारत स्वतंत्रता आंदोलन के दौर से गुजर रहा था। अनेक राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन चल रहे थे, लेकिन डॉ. हेडगेवार का मानना था कि राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल राजनीतिक स्वतंत्रता में नहीं, बल्कि चरित्रवान, संगठित और राष्ट्रनिष्ठ नागरिकों के निर्माण में निहित है।
उन्होंने एक ऐसा संगठन खड़ा करने का विचार रखा जो व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण का कार्य करे। संघ का मूल मंत्र रहा—”व्यक्ति निर्माण से समाज निर्माण और समाज निर्माण से राष्ट्र निर्माण।”
यही कारण है कि संघ ने प्रारंभ से ही शाखा को अपने कार्य का केंद्र बनाया। शाखा केवल व्यायाम, खेल या प्रार्थना का कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि वह एक जीवंत सामाजिक विद्यालय थी जहाँ स्वयंसेवक अनुशासन, नेतृत्व, संगठन, समरसता, सेवा और राष्ट्रभाव का अभ्यास करता था।
व्यक्ति निर्माण: संघ की सबसे बड़ी उपलब्धि
संघ की लगभग सौ वर्षों की यात्रा में यदि उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि खोजी जाए तो वह किसी भवन, कार्यालय या राजनीतिक प्रभाव में नहीं, बल्कि उसके द्वारा तैयार किए गए लाखों स्वयंसेवकों में दिखाई देती है।
संघ ने ऐसे कार्यकर्ताओं की पीढ़ियाँ तैयार कीं जिन्होंने शिक्षा, पत्रकारिता, सामाजिक सेवा, राजनीति, ग्राम विकास, सहकारिता, श्रमिक आंदोलन, छात्र संगठनों और सांस्कृतिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन स्वयंसेवकों की सबसे बड़ी पहचान उनका अनुशासन, सादगी, प्रामाणिकता और संगठन के प्रति समर्पण रही।
पुराने स्वयंसेवकों का अनुभव बताता है कि उस दौर में संघ का प्रत्येक कार्यकर्ता केवल एक सदस्य नहीं बल्कि परिवार का हिस्सा माना जाता था। शाखा कार्यवाह, नगर कार्यवाह, जिला कार्यवाह, विभाग कार्यवाह और प्रचारक अपने स्वयंसेवकों को व्यक्तिगत रूप से जानते थे। किसी कार्यकर्ता के घर में समस्या हो, शिक्षा का प्रश्न हो, रोजगार का संकट हो या पारिवारिक कठिनाई—संगठन उसके साथ खड़ा दिखाई देता था।
यही आत्मीयता संघ की सबसे बड़ी पूँजी थी।
प्रचारक: संघ की रीढ़
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति में प्रचारक व्यवस्था को उसकी सबसे विशिष्ट पहचान माना जाता है। प्रचारक वह स्वयंसेवक होता है जो अपना जीवन संगठन और समाज के लिए समर्पित कर देता है।
संघ के प्रचारकों के बारे में समाज में अनेक बातें प्रचलित हैं। उन्हें त्याग, तपस्या, अनुशासन और सादगी का प्रतीक माना जाता है। सीमित संसाधनों में प्रवास करना, स्वयंसेवकों के घरों में रहना, गाँव-गाँव जाकर शाखाएँ खड़ी करना और नए कार्यकर्ताओं का निर्माण करना प्रचारकों की पहचान रही है।
स्वतंत्रता के बाद से लेकर आज तक हजारों प्रचारकों ने देश के दूरस्थ क्षेत्रों में कार्य करते हुए संघ को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार दिया। अनेक प्रचारकों ने शिक्षा, सेवा, वनवासी कल्याण, सामाजिक समरसता और ग्राम विकास के क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया।
लेकिन समय बदलने के साथ प्रचारकों की भूमिका भी बदली है। आज उन्हें केवल संगठन विस्तार ही नहीं, बल्कि मीडिया प्रबंधन, डिजिटल संचार, सामाजिक अभियानों, बौद्धिक कार्यक्रमों और विभिन्न क्षेत्रों के समन्वय की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ती है। इससे उनका कार्यक्षेत्र बढ़ा है, लेकिन कई वरिष्ठ स्वयंसेवक मानते हैं कि व्यक्तिगत संपर्क की गहराई पहले जैसी नहीं रही।
विस्तार की अभूतपूर्व सफलता
पिछले तीन दशकों में संघ का विस्तार अभूतपूर्व रूप से हुआ है। देश के लगभग प्रत्येक राज्य में शाखाओं का नेटवर्क मजबूत हुआ है। छात्र, युवा, किसान, मजदूर, महिलाएँ, शिक्षक, वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर और पेशेवर वर्गों तक संघ की पहुँच बढ़ी है।
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय राजनीति में उभार के बाद संघ की विचारधारा और कार्यपद्धति के प्रति समाज में जिज्ञासा भी बढ़ी। बड़ी संख्या में नए लोग संघ और उसके प्रेरित संगठनों से जुड़े। संघ से प्रेरित अनेक संगठन शिक्षा, सेवा, ग्राम विकास, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक समरसता के क्षेत्रों में सक्रिय हुए।
उत्तराखंड से लेकर पूर्वोत्तर भारत और दक्षिण भारत तक संगठन ने अपना प्रभाव बढ़ाया। उत्तराखंड में विशेष रूप से आपदा राहत, पर्यावरण संरक्षण, ग्राम विकास और सांस्कृतिक संरक्षण के क्षेत्रों में संघ प्रेरित संगठनों की सक्रिय भूमिका रही है। 2013 की केदारनाथ आपदा के दौरान स्वयंसेवकों द्वारा किए गए राहत कार्यों की व्यापक सराहना हुई थी।
लेकिन यहीं से शुरू होता है असली प्रश्न
संघ का विस्तार जितना बड़ा हुआ है, उतना ही बड़ा प्रश्न भी सामने आया है—क्या संख्या बढ़ने के साथ गुणवत्ता भी बढ़ रही है?
कैलाश विजयवर्गीय का कथन इसी प्रश्न की ओर संकेत करता प्रतीत होता है। जब वे कहते हैं कि “बहुत भीड़ हो गई है और इस भीड़ में अच्छे इंसानों की कमी है”, तो यह केवल किसी व्यक्ति विशेष की आलोचना नहीं है। यह उस व्यापक चिंता की अभिव्यक्ति है जो कई वरिष्ठ स्वयंसेवकों और विचारकों के मन में समय-समय पर उठती रही है।
किसी भी संगठन के विस्तार के साथ ऐसे लोग भी जुड़ते हैं जिनका संगठन की मूल कार्यपद्धति और संस्कारों से गहरा परिचय नहीं होता। कई बार पद, प्रतिष्ठा, सामाजिक प्रभाव या राजनीतिक कारणों से भी लोग संगठन के निकट आते हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति निर्माण की मूल प्रक्रिया कमजोर पड़ने का खतरा उत्पन्न होता है।
शाखा से सोशल मीडिया तक का बदलाव
संघ का प्रारंभिक विकास व्यक्ति-से-व्यक्ति संपर्क पर आधारित था। शाखा, बैठक, बौद्धिक वर्ग, प्रशिक्षण शिविर और व्यक्तिगत संवाद संगठन की आत्मा थे।
आज सोशल मीडिया का युग है। विचारों का प्रसार पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज हो गया है। संघ की विचारधारा से प्रभावित होने के लिए अब शाखा में जाना अनिवार्य नहीं रह गया। हजारों लोग डिजिटल माध्यमों से विचारों से जुड़ रहे हैं।
लेकिन इस परिवर्तन के साथ एक चुनौती भी आई है। डिजिटल जुड़ाव और वैचारिक सहमति, शाखा आधारित प्रशिक्षण और संस्कार निर्माण का पूर्ण विकल्प नहीं बन सकते। संगठन की मूल शैली—संयम, संवाद, धैर्य, अनुशासन और आत्मनियंत्रण—व्यक्तिगत संपर्क से ही विकसित होती है।
यही कारण है कि आज कई वरिष्ठ कार्यकर्ता व्यक्ति निर्माण की पारंपरिक प्रक्रिया को नए युग के अनुरूप और अधिक सशक्त बनाने की आवश्यकता महसूस करते हैं।
बदलता समाज, बदलती चुनौतियाँ
आज का भारत 1970, 1980 या 1990 के दशक का भारत नहीं है। शहरीकरण बढ़ा है, परिवार छोटे हुए हैं, उपभोक्तावाद बढ़ा है, करियर की प्रतिस्पर्धा तेज हुई है और डिजिटल जीवनशैली ने सामाजिक व्यवहार को बदल दिया है।
युवाओं की प्राथमिकताएँ बदल रही हैं। पलायन, रोजगार, तकनीक और वैश्विक संस्कृति का प्रभाव बढ़ा है। ऐसे में संघ सहित सभी मूल्य आधारित संगठनों के सामने चुनौती है कि वे नई पीढ़ी को अपनी मूल अवधारणाओं से कैसे जोड़ें।
यदि व्यक्ति निर्माण की प्रक्रिया को आधुनिक संदर्भों में पुनर्परिभाषित नहीं किया गया, तो केवल विस्तार से संगठन की मूल शक्ति सुरक्षित नहीं रह सकती।
आत्मीयता का संकट
संघ की सबसे बड़ी ताकत उसकी आत्मीयता रही है। पुराने स्वयंसेवक बताते हैं कि प्रचारकों और वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का घर-घर जाना, परिवारों से संपर्क रखना और व्यक्तिगत संबंध बनाए रखना संगठन की संस्कृति का हिस्सा था।
आज संपर्क के साधन बढ़ गए हैं, लेकिन आत्मीय संवाद घटा है। मोबाइल और व्हाट्सएप ने सूचना का आदान-प्रदान आसान किया है, परंतु भावनात्मक जुड़ाव का स्थान नहीं ले सके हैं।
यही कारण है कि अनेक वरिष्ठ स्वयंसेवक मानते हैं कि संगठन को अपने मूल संस्कारों के साथ-साथ आत्मीय संपर्क की परंपरा को भी पुनर्जीवित करना होगा।
आत्ममंथन ही संगठन की जीवंतता है
कैलाश विजयवर्गीय का बयान संघ के लिए चुनौती नहीं, बल्कि अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। इतिहास बताता है कि बड़े संगठन तभी जीवित और प्रभावी रहते हैं जब वे समय-समय पर स्वयं का मूल्यांकन करते हैं।
संघ की विशेषता भी यही रही है कि उसने परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को बदला, लेकिन अपने मूल विचार को नहीं छोड़ा। आज भी आवश्यकता किसी व्यक्ति, पीढ़ी या व्यवस्था को दोष देने की नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि व्यक्ति निर्माण, आत्मीयता, प्रशिक्षण, अनुशासन और सेवा की मूल परंपरा को और अधिक मजबूत किया जाए।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का लगभग सौ वर्षों का इतिहास यह सिद्ध करता है कि उसकी वास्तविक शक्ति उसकी शाखाओं की संख्या, भवनों या प्रभाव में नहीं, बल्कि उसके संस्कारित स्वयंसेवकों में निहित है। यदि व्यक्ति निर्माण की प्रक्रिया मजबूत रहेगी तो संगठन का विस्तार भी सार्थक होगा। यदि यह प्रक्रिया कमजोर पड़ती है तो संख्या बढ़ने के बावजूद संगठन की आत्मा प्रभावित हो सकती है।
कैलाश विजयवर्गीय का कथन इसी मूल प्रश्न की ओर ध्यान आकर्षित करता है। भीड़ बढ़ना अच्छी बात है, लेकिन यदि उस भीड़ में संस्कार, प्रामाणिकता, अनुशासन, आत्मीयता और राष्ट्रभाव का अनुपात घटने लगे तो यह किसी भी संगठन के लिए चिंतन का विषय बन जाता है।
आज आवश्यकता संख्या बढ़ाने से अधिक उस परंपरा को सशक्त करने की है जिसने स्वयंसेवक को केवल कार्यकर्ता नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए आदर्श नागरिक बनाया। यही संघ की मूल शक्ति थी, है और भविष्य में भी बनी रह सकती है।

