उत्तराखण्ड

वन गमन, केवट लीला और दशरथ मरण के भावुक प्रसंगों ने दर्शकों को किया भावविभोर

-राम के वियोग में राजा दशरथ ने त्यागे प्राण, सरस्वती कला मंच की रामलीला में भावुक हुए दर्शक
-केवट की भक्ति और प्रभु राम के वनगमन का सजीव मंचन, दशरथ मरण के साथ लीला का समापन

विकासनगर। सरस्वती कला मंच की रामलीला में आज राम वनगमन, राजा गुह से मिलन, केवट लीला, सुमंत की वापसी और राजा दशरथ के मरण के मार्मिक प्रसंगों का मंचन किया गया। कलाकारों ने अपने सशक्त अभिनय से भगवान राम के वनवास, केवट की अनन्य भक्ति और पुत्र वियोग में राजा दशरथ के प्राण त्यागने के दृश्यों को जीवंत कर दिया। लीला के प्रथम दृश्य में भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण सुमंत के साथ वन की ओर प्रस्थान करते हैं। मार्ग में विश्राम के दौरान राम लक्ष्मण से कहते हैं कि वन में अब उन्हें राजसी सुख-सुविधाओं के बजाय साधारण जीवन व्यतीत करना होगा। यह देखकर सुमंत व्यथित हो उठते हैं। वे भावुक होकर कहते हैं कि जिस मस्तक पर राजमुकुट सुशोभित होता था, आज उसी पर वनवास की कठिनाइयां आ गई हैं। प्रभु राम की यह स्थिति देखकर उनका हृदय दुख से भर जाता है।
इसके बाद भगवान राम, सीता और लक्ष्मण गंगा तट पर पहुंचते हैं। लक्ष्मण केवट को आवाज देकर गंगा पार कराने के लिए बुलाते हैं। केवट प्रभु राम से कहते हैं कि वे उनके चरण धोए बिना उन्हें नाव में नहीं बैठा सकते, क्योंकि उनके चरणों के स्पर्श से पत्थर की शिला अहिल्या नारी बन गई थीं। इस प्रसंग में केवट की अनूठी भक्ति और भगवान राम के प्रति उसकी श्रद्धा का सुंदर चित्रण किया गया।
केवट की बात सुनकर भगवान राम कहते हैं कि वे उसका आशय नहीं समझ पा रहे हैं। इस पर केवट विनम्रतापूर्वक चरण धोने की अपनी इच्छा दोहराता है। अंततः भगवान राम उसकी भक्ति स्वीकार कर लेते हैं और गंगा पार करते हैं। गंगा पार पहुंचने के बाद माता सीता केवट को उतराई देने की बात कहती हैं, लेकिन केवट धन-दौलत के बजाय प्रभु की भक्ति में लीन रहने का आशीर्वाद मांगता है। यह दृश्य भक्ति, समर्पण और निष्काम सेवा का संदेश देता है।
इसके उपरांत सुमंत अयोध्या लौटते हैं। मार्ग में अशुभ संकेतों से व्याकुल सुमंत राजमहल पहुंचकर राजा दशरथ को राम, सीता और लक्ष्मण के वन में चले जाने का समाचार सुनाते हैं। राजा दशरथ व्याकुल होकर पूछते हैं कि सुमंत उनकी आंखों के तारे और जीवन के आधार राम को कहां छोड़ आए हैं। सुमंत बताते हैं कि उन्होंने भगवान राम को वापस लौटने के लिए बहुत समझाया, लेकिन वे पिता की आज्ञा का पालन करते हुए वन की ओर प्रस्थान कर गए।
सुमंत यह भी बताते हैं कि राम ने संदेश दिया है कि वे वन में कुशलपूर्वक हैं और पिता को उनकी चिंता नहीं करनी चाहिए। चैदह वर्ष का वनवास पूरा होने के बाद वे अवश्य लौटेंगे। पुत्र वियोग की पीड़ा सहन न कर पाने के कारण राजा दशरथ राम-राम कहते हुए अपने प्राण त्याग देते हैं। इस मार्मिक दृश्य ने उपस्थित दर्शकों को भावुक कर दिया। राजा दशरथ के मरण के बाद गुरु वशिष्ठ भरत को उनके ननिहाल से अयोध्या बुलाने का निर्णय लेते हैं। इसी प्रसंग के साथ आज की रामलीला का समापन हुआ। रामलीला के मंचन में नवनीत वर्मा, विकास शर्मा, विनीत रोहिल्ला, नोनी राणा, राहुल मित्तल, शाश्वत कपिल, प्रदीप ठाकुर, संजीव भारद्वाज, अनिल गोयल, राकेश गुलरिया, रविंद्र सैनी, नैतिक दीवान, संजय धीमान, संजय कुमार, मनोज, राजीव, कनिष्क, राजकुमार, सतपाल राठौर, पीके दुबे, गोपाल गुप्ता, आंचल, चंद्रकला और आस्था गुप्ता सहित अन्य कलाकारों ने विभिन्न भूमिकाओं में सहभागिता की।

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